DRDO विकसित करेगा स्वदेशी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग पॉड, आसमान में ही लड़ाकू विमानों में भरा जाएगा ईंधन

DRDO विकसित करेगा स्वदेशी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग पॉड, आसमान में ही लड़ाकू विमानों में भरा जाएगा ईंधन


भारत को रक्षा क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम उठाया गया है।

भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को आसमान की असीम ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने एक 'स्वदेशी एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग पॉड' (Air-to-Air Refueling Pod) विकसित करने का बीड़ा उठाया है।

इसके लिए 2 सितंबर 2026 को DRDO के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) फ्रेमवर्क के तहत एक टेंडर (RFP) भी जारी कर दिया गया है।

आसान भाषा में समझें तो, युद्ध के दौरान अब हमारे लड़ाकू विमानों को ईंधन भरने के लिए वापस बेस पर नहीं लौटना पड़ेगा; आसमान में उड़ते-उड़ते ही उनका टैंक फुल हो जाएगा।

हवा में ईंधन भरने की तकनीक को सैन्य भाषा में 'फोर्स मल्टीप्लायर' (Force Multiplier) कहा जाता है, क्योंकि यह लड़ाकू विमानों की रेंज और उनके हवा में टिके रहने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है।
  • तकनीकी क्षमता: DRDO द्वारा विकसित किया जा रहा यह स्वदेशी रिफ्यूलिंग पॉड 10,000 से लेकर 40,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर भी सुचारू रूप से काम करने में सक्षम होगा।
  • रफ्तार: युद्ध के समय हर सेकंड कीमती होता है। इसलिए, यह सिस्टम एक मिनट में 2,000 यूएस गैलन (लगभग 7,500 लीटर) ईंधन लड़ाकू विमान में ट्रांसफर कर सकेगा।
  • होज़-एंड-ड्रोग (Hose-and-Drogue) तकनीक: ठीक वैसे ही जैसे वायुसेना के मौजूदा रूसी IL-78 टैंकर विमानों में एक लचीले पाइप (Hose) और कीप जैसी छतरी (Drogue) के जरिए फ्यूल भरा जाता है, यह स्वदेशी तकनीक भी इसी प्रमाणित तर्ज पर काम करेगी।
  • स्मार्ट डिजाइन: एक टैंकर विमान में ऐसे कुल तीन पॉड लगाए जा सकेंगे—दो पंखों पर और एक वैकल्पिक तौर पर विमान के निचले हिस्से (फ्यूजलेज) में। इन्हें विमान के अंदर बैठे एक ऑपरेटर द्वारा विशेष स्टेशन से कंट्रोल किया जाएगा, जिससे एक ही समय में कई लड़ाकू विमान ईंधन ले सकेंगे।
वर्तमान में, हमारी वायुसेना हवा में रिफ्यूलिंग के लिए अपने Il-78 MARS बेड़े पर निर्भर है। लेकिन विदेशी सप्लायर्स पर इस निर्भरता को खत्म करना आज के समय की सबसे बड़ी रणनीतिक जरूरत है।

इस नए पॉड का सबसे क्रांतिकारी फायदा यह होगा कि युद्ध जैसी आपात स्थिति में वायुसेना अपने भारी-भरकम ट्रांसपोर्ट विमानों—जैसे C-17 ग्लोबमास्टर, C-130J सुपर हरक्यूलिस या भविष्य के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA)—को भी 'बैकअप टैंकर' में तब्दील कर सकेगी।

यह पूरा प्रोजेक्ट हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) के उस मौजूदा समझौते के ऊपर एक 'सप्लीमेंट्री' (पूरक) कार्यक्रम के तौर पर काम करेगा, जिसके तहत कमर्शियल बोइंग विमानों को रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट में बदला जा रहा है।

DRDO का यह नया कदम न केवल विदेशी उपकरणों पर भारत की निर्भरता को खत्म करेगा, बल्कि दुश्मन की सीमा में गहराई तक घुसकर अचूक हमले (Deep Strike) करने की वायुसेना की क्षमता को एक नई धार देगा। सही मायनों में, यह स्वदेशी रक्षा तकनीक आसमान में भारत के बढ़ते वर्चस्व की एक नई इबारत लिखेगी।
 

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