भारतीय वायुसेना (IAF) की रीढ़ माना जाने वाला Su-30MKI एक बेहद ताकतवर और विशाल फाइटर जेट है।
अपनी भारी-भरकम मारक क्षमता और लंबी दूरी तक मार करने की ताकत के कारण यह दुश्मनों के लिए काल है, लेकिन इसका बड़ा आकार और पारंपरिक एयरोडायनामिक डिजाइन इसे एक चुनौती भी देता है—यह दुश्मन के रडार पर आसानी से दिख जाता है।
आधुनिक युद्ध क्षेत्र में 'स्टील्थ' (रडार से छुपने की क्षमता) का महत्व बहुत बढ़ गया है। ऐसे में भारत के सामने सवाल यह था कि क्या इस विमान को पूरी तरह से 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर (जैसे F-35 या भारत के आगामी AMCA) में बदला जाए?
इसका जवाब है—नहीं। भारतीय वायुसेना और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने एक बेहद व्यावहारिक और स्मार्ट 'सुपर सुखोई' अपग्रेड प्लान तैयार किया है। इसका उद्देश्य विमान को पूरी तरह से अदृश्य बनाना नहीं, बल्कि इसे 'लोअर-ऑब्जर्वेबल' (रडार पर कम दिखने वाला) बनाना है, ताकि दुश्मन इसे आसानी से निशाना न बना सके।
पूरी तरह से स्टील्थ विमान बनाने के लिए उसके मूल ढांचे (एयरफ्रेम) में बदलाव करना पड़ता है, जो Su-30MKI के लिए संभव नहीं है। इसलिए, भारत ने रडार एब्जॉर्बिंग मटेरियल्स (RAM) का रास्ता चुना है।
DRDO ने स्वदेशी स्तर पर ऐसे खास पेंट और सामग्रियां विकसित कर ली हैं, जिनमें मैग्नेटिक फंक्शनल फिलर्स का इस्तेमाल होता है। यह पेंट रडार की तरंगों को सोख लेता है।
इस तकनीक का इस्तेमाल पूरे विमान पर करने के बजाय, केवल उन हिस्सों पर किया जाएगा जहाँ से रडार की तरंगें सबसे ज्यादा टकराकर वापस लौटती हैं:
- इंजन इंटेक्स (Engine Intakes): फाइटर जेट के बड़े एयर इंटेक्स रडार तरंगों के लिए किसी इको-चैंबर की तरह काम करते हैं और अंदरूनी ढांचे को दर्शाते हैं। इन हिस्सों पर खास कोटिंग करके रडार रिफ्लेक्शन को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- पैनल्स और विंग्स: विमान के ऐसे बाहरी हिस्से और पैनल्स, जिन पर ज्यादा ढांचागत दबाव नहीं होता, उन्हें रडार-एब्जॉर्बिंग कंपोजिट मैटेरियल से बदला जा सकता है।
- कैनोपी और राडोम (Nose Cone): कॉकपिट के शीशे (कैनोपी) और राडोम को इस तरह से ट्रीट किया जाएगा कि वे दुश्मन के रडार तरंगों को तो भटका दें, लेकिन विमान के अंदर लगे हमारे अपने रडार के काम में कोई बाधा न डालें।
- एजेस और जॉइंट्स: विंग्स के किनारे, कैनार्ड्स और लैंडिंग गियर के दरवाजों की अलाइनमेंट को बेहतर करके और वहां खास कोटिंग लगाकर भी रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) को घटाया जाएगा।
यहीं पर भारत का व्यापक 'सुपर सुखोई' अपग्रेड काम आता है। इस विमान को स्वदेशी उत्तम/विरूपाक्ष AESA रडार, अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) सूट, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक (IRST) सिस्टम और पैसिव सेंसर्स से लैस किया जा रहा है।
जब यह शानदार एवियोनिक्स अस्त्र Mk-1, Mk-2 और रुद्रम जैसी स्वदेशी लंबी दूरी की मिसाइलों (BVR) के साथ जुड़ेंगे, तो Su-30MKI की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
भले ही दुश्मन का रडार हमारे विमान को देख ले, लेकिन हमारा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम उनके रडार को जाम कर देगा और हमारे सेंसर्स दुश्मन को सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही पहचान कर मिसाइल दाग देंगे। दुश्मन को प्रतिक्रिया करने का समय ही नहीं मिलेगा।
वायुसेना अपनी पूरी फ्लीट को एक साथ ग्राउंड नहीं कर सकती। इसलिए, इस तकनीक को विमानों के तय ओवरहॉल साइकिल (Routine Maintenance) के दौरान लागू करने की योजना है। इससे वायुसेना को बिना किसी बड़े ढांचागत बदलाव के, स्वदेशी RAM तकनीक और रडार एब्जॉर्बिंग स्ट्रक्चर्स का परीक्षण करने का मौका मिलेगा।
भारत का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है—Su-30MKI की विशाल पेलोड क्षमता और शानदार रेंज से कोई समझौता किए बिना, इसे दुश्मन के लिए टारगेट करना मुश्किल बनाना है। अत्याधुनिक भारतीय तकनीक से लैस यह "लोअर-ऑब्जर्वेबल" सुखोई आने वाले कई दशकों तक आसमान में अपनी बादशाहत कायम रखेगा।