भारतीय वायुसेना (IAF) के शस्त्रागार में एक बेहद क्रांतिकारी और घातक विचार आकार ले रहा है। कल्पना कीजिए कि हमारा शक्तिशाली सुखोई-30 (Su-30MKI) लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके में खुद जाने के बजाय, एक 'मानवरहित मिसाइल कैरियर ड्रोन' को आगे भेज दे।
यह ड्रोन हवा में ही सुखोई से लॉन्च होगा, दुश्मन के बेहद करीब जाएगा और सुरक्षित दूरी से अस्त्र मार्क-2 (Astra Mk-2) जैसी घातक मिसाइलें दागकर वापस आ जाएगा। इस तरह की तकनीक हवाई युद्ध के मायने पूरी तरह से बदल सकती है।
सुखोई-30 विमान भारी हथियार ले जाने की अपनी असाधारण क्षमता (लगभग 8 टन पेलोड) के लिए जाना जाता है।
इसी खूबी का फायदा उठाते हुए लगभग 2.5 टन वजनी एक जेट-पावर्ड ड्रोन को विमान से लॉन्च करने की योजना पर विचार किया जा सकता है।
यह कोई आम मिसाइल नहीं होगी, बल्कि एक छोटा मानवरहित विमान (UFP) होगा, जिसमें अपना खुद का जेट इंजन, नेविगेशन सिस्टम, संचार उपकरण और बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइलें (BVRAAM) लगी होंगी।
इस तकनीक से हवाई युद्ध दो चरणों में बंट जाएगा। पहले चरण में, सुखोई-30 सुरक्षित दूरी से इस ड्रोन को लॉन्च करेगा। दूसरे चरण में, यह कैरियर ड्रोन दुश्मन के इलाके में आगे की तरफ उड़ान भरेगा और सही लोकेशन पर पहुँचकर अस्त्र मार्क-2 मिसाइल फायर करेगा।
अस्त्र मार्क-2 एक स्वदेशी, डुअल-पल्स मोटर वाली अत्याधुनिक मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता (रेंज) 160 से 200 किलोमीटर के पार है।
जब इस मिसाइल को सीधे सुखोई से दागने के बजाय एक फॉरवर्ड कैरियर ड्रोन से लॉन्च किया जाएगा, तो इसकी 'लॉन्च ज्योमेट्री' (एंगल और गति) कई गुना बेहतर हो जाएगी।
आसान शब्दों में कहें तो यह कैरियर ड्रोन दुश्मन के करीब एक उड़ते हुए 'रिमोट मिसाइल गोदाम' की तरह काम करेगा।
इससे अस्त्र मार्क-2 की पहले से ही खतरनाक रेंज और ऊर्जा में अप्रत्याशित वृद्धि होगी, जिससे दुश्मन को बचने का कोई मौका नहीं मिलेगा।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस कैरियर ड्रोन को भारी-भरकम फाइटर क्लास रडार ले जाने की जरूरत ही नहीं है।
आज भारतीय वायुसेना का कॉम्बैट सिस्टम बेहद स्मार्ट और नेटवर्क-सेंट्रिक हो चुका है। आसमान में मौजूद हमारे 'नेत्र' (Netra) या 'फाल्कन' AWACS विमान दुश्मन की टोह लेंगे और सिक्यॉर डेटा-लिंक के जरिए सुखोई-30 या अन्य सेंसर विमानों को जानकारी भेजेंगे।
AWACS से मिलने वाले शुरुआती टार्गेट डेटा को सुखोई अपने कैरियर ड्रोन को ट्रांसफर कर देगा।
उड़ान के दौरान भी यह ड्रोन नए डेटा के साथ अपडेट हो सकेगा और टर्मिनल फेज (आखिरी चरण) में अस्त्र मिसाइल का अपना स्वदेशी आरएफ (RF) सीकर दुश्मन को लॉक करके उसे नेस्तनाबूद कर देगा।
यह रणनीति दुश्मन के हाई-वैल्यू टार्गेट्स—जैसे उनके AWACS, हवा में ईंधन भरने वाले टैंकर विमानों या फाइटर जेट्स के झुंड—को तबाह करने के लिए अचूक साबित होगी।
दुश्मन के भारी एयर डिफेन्स ग्रिड से दूर रहकर, सुखोई-30 दुश्मन पर कहर बरपा सकेगा।
इससे न केवल हमारे हथियारों के नष्ट होने का जोखिम कम होगा, बल्कि हमारे जांबाज पायलटों की सुरक्षा भी शत-प्रतिशत सुनिश्चित होगी।
कागजों पर यह रणनीति जितनी शानदार लगती है, इसे हकीकत में बदलना इंजीनियरिंग का एक बड़ा इम्तिहान होगा।
2.5 टन के पेलोड के अंदर एक मजबूत एयरफ्रेम, जेट इंजन, फ्यूल, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, एवियोनिक्स, डेटा-लिंक और भारी-भरकम अस्त्र मिसाइलों को फिट करना बेहद जटिल काम है।
इसके अलावा, दुश्मन के हवाई क्षेत्र में घुसने के लिए इस कैरियर ड्रोन का तेज, फुर्तीला और 'लो-ऑब्जर्वेबल' (रडार की पकड़ में न आने वाला) होना भी जरूरी है ताकि यह खुद दुश्मन का शिकार न बन जाए।
ब्रह्मोस-ए (BrahMos-A) जैसी बड़ी मिसाइलों को मॉडिफाई करने के बजाय, सुखोई के पेलोड के हिसाब से एक नया अनमैन्ड कैरियर बनाना ज्यादा कारगर हो सकता है।
भारत का HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) पहले से ही 'कैट्स वॉरियर' (CATS Warrior - Combat Air Teaming System) जैसे लॉयल विंगमैन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, जो इसी भविष्य की युद्धनीति का हिस्सा हैं।
अगर भारत इस प्रणाली को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो वायुसेना को 'स्टैंड-ऑफ एयर कॉम्बैट' में एक अद्वितीय बढ़त मिलेगी।
भारत को मिसाइल की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, बल्कि मिसाइल फायर करने के शुरुआती पॉइंट को ही दुश्मन के करीब शिफ्ट कर दिया जाएगा, जबकि हमारे फाइटर जेट्स सुरक्षित आसमान में अजेय बने रहेंगे।