यदि पाकिस्तान को मिला तुर्की का 'Hava SOJ' जैमर, तो क्या भारत का IACCS और S-400 तोड़ पाएंगे इसका चक्रव्यूह?

यदि पाकिस्तान को मिला तुर्की का 'Hava SOJ' जैमर, तो क्या भारत का IACCS और S-400 तोड़ पाएंगे इसका चक्रव्यूह?


आधुनिक युद्ध अब केवल तोपों, टैंकों और मिसाइलों के भरोसे नहीं लड़े जाते, बल्कि आसमान में अदृश्य तरंगों और 'इलेक्ट्रॉनिक युद्ध' (Electronic Warfare - EW) के मोर्चे पर लड़े जाते हैं।

हाल ही में तुर्की के 'Hava SOJ' (स्टैंड-ऑफ जैमर) ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

तुर्की और पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य जुगलबंदी (जैसे ड्रोन और युद्धपोतों की डील) को देखते हुए, यह सवाल उठना लाजमी है कि अगर भविष्य में यह घातक इलेक्ट्रॉनिक हथियार पाकिस्तानी वायुसेना (PAF) के हाथ लग गया, तो क्या होगा? क्या यह भारत के अभेद्य एयर डिफेंस नेटवर्क को भेद पाएगा?

आइए, जटिल मिलिट्री टेक्नोलॉजी को बेहद आसान भाषा में समझते हुए इस पूरी रणनीति का विश्लेषण करते हैं।

तुर्की का Hava SOJ असल में आसमान में उड़ने वाला एक 'महा-हैकर' है। इसे बॉम्बार्डियर ग्लोबल 6000 (Bombardier Global 6000) बिजनेस जेट के प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है और इसमें तुर्की की प्रमुख रक्षा कंपनी 'ASELSAN' के अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम लगे हैं।

एक आम लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके में घुसकर बम गिराता है, लेकिन एक 'स्टैंड-ऑफ जैमर' ऐसा नहीं करता। यह भारत की सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर, हमारी सर्फेस-टू-एयर मिसाइलों (SAM) की मारक क्षमता से बाहर (High Altitude पर) सुरक्षित उड़ता रह सकता है।

वहां से यह शक्तिशाली रेडियो तरंगें भेजकर भारतीय रडार नेटवर्क को अंधा (Jam), भ्रमित (Deceive) या सुन्न करने की कोशिश करेगा, ताकि पाकिस्तानी लड़ाकू विमान छुपकर भारतीय सीमा में घुसपैठ कर सकें।

यह जैमर कोई साधारण मशीन नहीं है; यह DRFM (Digital Radio Frequency Memory) जैसी खतरनाक तकनीक का इस्तेमाल करता है।

इसे ऐसे समझिए: जैसे कोई आपकी आवाज़ को रिकॉर्ड कर ले और फिर फोन पर हूबहू आपकी ही आवाज़ में किसी और से बात करके उसे धोखा दे।

ठीक इसी तरह, जब भारतीय रडार आसमान में स्कैनिंग तरंगें भेजते हैं, तो यह जैमर उन तरंगों को पकड़ लेता है, उन्हें डिजिटल रूप में सेव करता है, और फिर उनमें चालाकी से बदलाव करके वापस हमारे रडार की ओर फेंक देता है।

नतीजा? हमारे रडार ऑपरेटर की स्क्रीन पर दर्जनों 'भूतिया' (False) लड़ाकू विमान दिखने लगेंगे, या फिर हवा में उड़ रहा असली पाकिस्तानी विमान अपनी सही जगह से कई किलोमीटर दूर नजर आएगा।

रूस से मिला S-400 Triumf (जिसे भारतीय वायुसेना 'सुदर्शन' भी बुलाती है) दुनिया का सबसे खतरनाक लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है। यह कोई एक सिंगल रडार नहीं है, बल्कि अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर काम करने वाले कई सर्विलांस और एंगेजमेंट रडारों का एक बेहद जटिल चक्रव्यूह है।

Hava SOJ जैसे जैमर इन्हीं रडार सिग्नल्स को हैक करने की कोशिश करते हैं।

लेकिन, S-400 को इसी 'इलेक्ट्रॉनिक युद्ध' को ध्यान में रखकर ही डिजाइन किया गया है। इसमें 'फ्रीक्वेंसी एजिलिटी' (Frequency Agility) और ECCM (Electronic Counter-Countermeasures) जैसी एंटी-जैमर तकनीकें हैं।

अगर जैमर S-400 के एक सिग्नल को जाम करने की कोशिश करेगा, तो S-400 पलक झपकते ही अपना वेवफॉर्म (Waveform) और फ्रीक्वेंसी बदल लेगा। यह एक चूहे-बिल्ली का खेल है, जिसमें S-400 को मात देना लगभग नामुमकिन है।

अगर पाकिस्तानी वायुसेना यह सोचती है कि वह एक जैमर विमान उड़ाकर भारत के एयर डिफेंस को सुला देगी, तो वे भारत के IACCS की ताकत को भूल रहे हैं। IACCS ने युद्ध के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है।

IACCS कोई एक मिसाइल या रडार नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतवर्ष में फैले मिलिट्री सेंसर्स का एक 'सुपर-ब्रेन' (महा-नेटवर्क) है।

यह सिस्टम देश के अलग-अलग कोनों में लगे ग्राउंड रडार, पहाड़ों पर तैनात सेंसर्स, और हवा में उड़ने वाले भारत के AWACS (जैसे 'नेत्र' और 'फाल्कन') को एक सिंगल नेटवर्क से जोड़ देता है।

इसे मल्टी-लेयर सेंसर फ्यूजन (Multi-Layer Sensor Fusion) कहते हैं। इसका मतलब है कि अगर दुश्मन का जैमर जमीन पर लगे हमारे किसी एक रडार को जाम कर भी दे, तो हवा में 30,000 फीट की ऊंचाई से निगरानी कर रहा 'नेत्र' विमान उस दुश्मन को किसी दूसरी दिशा और अलग फ्रीक्वेंसी से देख लेगा।

एक जैमर एक ही समय में जमीन और आसमान दोनों जगह के रडारों को जाम नहीं कर सकता। एक आंख बंद होगी, तो नेटवर्क की 100 और आंखें खुल जाएंगी।

इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) का एक बहुत ही रोचक सिद्धांत है - "अंधेरे में जो सबसे बड़ी टॉर्च जलाता है, वह सबसे पहले नजर में आता है।"

अपना काम करने के लिए तुर्की के Hava SOJ जैमर को भारी मात्रा में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ऊर्जा आसमान में छोड़नी पड़ेगी। जैसे ही वह ऐसा करेगा, वह खुद भारत के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में एक चमकते हुए बल्ब की तरह दिखने लगेगा।

चूंकि भारत के IACCS नेटवर्क में सेंसर भौगोलिक रूप से बहुत दूर-दूर फैले हुए हैं, वे तुरंत 'Triangulation' (त्रिकोणीय मापन) तकनीक का इस्तेमाल करके उस जैमर की सटीक लोकेशन निकाल लेंगे।

इसके बाद, भारतीय वायुसेना के सुखोई-30MKI या राफेल लड़ाकू विमान अपनी लॉन्ग-रेंज 'अस्त्र' (Astra) या 'मीटिओर' (Meteor) मिसाइलों के साथ उस उड़ते हुए जैमर का शिकार करने के लिए निकल पड़ेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर प्लेटफॉर्म छुपने की बजाय खुद अपना पता बता बैठेगा।

अंत में, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध कोई हॉलीवुड फिल्म का जादू नहीं है, बल्कि तकनीक का निरंतर विकास (Evolution) है। भविष्य का युद्ध किसी एक बेहतरीन लड़ाकू विमान या जैमर से नहीं, बल्कि 'नेटवर्क-सेंट्रिक' (Network-Centric) ताकत से जीता जाएगा।

भारत की रक्षा रणनीति अब पूरी तरह से इस इंटरकनेक्टेड कॉम्बैट नेटवर्क पर निर्भर है। तुर्की का Hava SOJ जैमर बेशक एक शानदार मशीन हो सकती है, लेकिन जब इसका सामना भारतीय वायुसेना के 'IACCS' की सामूहिक शक्ति, 'नेत्र' की पैनी नजर और S-400 के प्रहार से होगा, तो दुश्मन का कोई भी इलेक्ट्रॉनिक चक्रव्यूह चंद मिनटों में चकनाचूर हो जाएगा।

भारत का आसमान पूरी तरह सुरक्षित हाथों में है। जय हिंद!
 

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