आत्मनिर्भर भारत की उड़ान अब और भी ऊंची हो रही है! आधुनिक युद्ध क्षेत्र में जहां दुश्मन चालाकी से छोटे-छोटे ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं भारत अपने आसमान को अभेद्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इसी कड़ी में देश के 'काउंटर-ड्रोन इकोसिस्टम' को एक बड़ी मजबूती मिली है।
रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली बेंगलुरु की प्रमुख टेक कंपनी, डायनेमिक्सन टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (Dynamixon Technologies) ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
कंपनी ने भारत के अत्याधुनिक डी4 एंटी-ड्रोन सिस्टम (D4 Anti-Drone System) के लिए खास 'रडार पेडेस्टल' (Radar Pedestal) का न सिर्फ सफलतापूर्वक निर्माण किया है, बल्कि उसका डेमोंस्ट्रेशन देकर हमारी सेनाओं के लिए इसकी डिलीवरी भी कर दी है।
यह घोषणा इस बात का प्रमाण है कि यह कोई कागजी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक हकीकत है जो हमारी सीमाओं पर काम आने वाली है।
अगर मिलिट्री की भारी-भरकम शब्दावली को किनारे रख दें, तो इसे समझना बहुत आसान है।
मान लीजिए कि रडार एक 'आंख' है जो आसमान में उड़ते दुश्मन के ड्रोन को मीलों दूर से ढूंढती है। अब इस आंख को चारों तरफ (360 डिग्री) घुमाने और दुश्मन के ड्रोन पर सटीक नजर गड़ाए रखने के लिए एक बेहद मजबूत और फुर्तीली 'गर्दन' की जरूरत होती है। यही 'गर्दन' रडार पेडेस्टल (Radar Stand) कहलाता है।
यह एक जटिल इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम होता है। छोटे ड्रोन्स बहुत तेजी से दिशा बदलते हैं, इसलिए रडार को भी उसी फुर्ती से बिना हिले-डुले घूमना पड़ता है।
डायनेमिक्सन ने अपनी 'प्रिसिजन इंजीनियरिंग' (सटीक इंजीनियरिंग) और 'मोशन कंट्रोल' तकनीक का लोहा मनवाते हुए यह सुनिश्चित किया है कि हमारा रडार पलक झपकते ही किसी भी ड्रोन को ट्रैक कर ले।
आपको बता दें कि यह पेडेस्टल जिस D4 (Drone Detect, Deter and Destroy) सिस्टम में लगेगा, वह भारत का एक अचूक रक्षा कवच है। इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) इसका निर्माण करती है।
दुश्मन का ड्रोन चाहे कितना भी छोटा (Nano या Micro) क्यों न हो, यह सिस्टम उसे 8 किलोमीटर दूर से ही रडार और सेंसर्स के जरिए पकड़ सकता है।
इसके बाद यह दो तरीके से दुश्मन का काम तमाम करता है:
- सॉफ्ट किल (Soft Kill): रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) जैमिंग और GPS स्पूफिंग के जरिए यह ड्रोन का उसके रिमोट कंट्रोल से संपर्क काट देता है, जिससे ड्रोन अंधा होकर गिर जाता है।
- हार्ड किल (Hard Kill): अगर ड्रोन फिर भी न माने, तो इसमें लगी 'लेजर वेपन' (Laser Directed Energy Weapon) की अदृश्य किरणें पल भर में ड्रोन को हवा में ही जलाकर राख कर देती हैं।
एक बड़े इलाके की लगातार निगरानी के लिए रडार का बिना अटके काम करना जरूरी है। अगर रडार स्टैंड में जरा भी खराबी या देरी हुई, तो दुश्मन का ड्रोन आंखों से ओझल हो सकता है।
हालांकि कंपनी ने अभी इसकी पेलोड कैपेसिटी (वजन सहने की क्षमता) या एलिवेशन एंगल जैसे तकनीकी आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं, लेकिन स्वदेशी स्तर पर ऐसा जटिल रडार पेडेस्टल बनाकर उन्होंने साबित कर दिया है कि अब भारत क्रिटिकल Defence तकनीक के लिए किसी विदेशी कंपनी का मोहताज नहीं है।
कुल मिलाकर, बेंगलुरु के हमारे इंजीनियरों ने देश की रक्षा पंक्ति में एक ऐसा मजबूत पहिया जोड़ दिया है, जो भविष्य के युद्धों में हमारे दुश्मनों के हर 'ड्रोन-षड्यंत्र' को नाकाम करने के लिए पूरी तरह तैयार है। जय हिंद!